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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 11

75 Sukta
13 Mantra
6/20/11
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं वृ॒ध इ॑न्द्र पू॒र्व्यो भू॑र्वरिव॒स्यन्नु॒शने॑ का॒व्याय॑। परा॒ नव॑वास्त्वमनु॒देयं॑ म॒हे पि॒त्रे द॑दाथ॒ स्वं नपा॑तम् ॥११॥

त्वम् । वृ॒धः । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्व्यः॑ । भूः॒ । व॒रि॒व॒स्यन् । उ॒शने॑ । का॒व्याय॑ । परा॑ । नव॑ऽवास्त्वम् । अ॒नु॒ऽदेय॑म् । म॒हे । पि॒त्रे । द॒दा॒थ॒ । स्वम् । नपा॑तम् ॥

Mantra without Swara
त्वं वृध इन्द्र पूर्व्यो भूर्वरिवस्यन्नुशने काव्याय। परा नववास्त्वमनुदेयं महे पित्रे ददाथ स्वं नपातम् ॥

त्वम्। वृधः। इन्द्र। पूर्व्यः। भूः। वरिवस्यन्। उशने। काव्याय। परा। नवऽवास्त्वम्। अनुऽदेयम्। महे। पित्रे। ददाथ। स्वम्। नपातम् ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (पूर्व्यः) प्राचीन से किये गये विद्वान् (त्वम्) आप (वृधः) वृद्धि करनेवालों की (वरिवस्यन्) सेवा करते हुए (उशने) कामना करते हुए (काव्याय) विद्वानों से उत्तम प्रकार शिक्षित के लिये दाता (भूः) हूजिये (स्वम्) अपने (नपातम्) पतन से रहित (अनुदेयम्) पश्चात् देने योग्य (नववास्त्वम्) नवीन निवास को (महे) बड़े (पित्रे) पालन करनेवाले के लिये (ददाथ) दीजिये और नहीं (परा) पीछे लीजिये अर्थात् न लौटाइये ॥११॥
Essence
जो राजा सब का यथायोग्य सत्कार करता है, वह पिता के तुल्य होता है ॥११॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥