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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 10

75 Sukta
13 Mantra
6/20/10
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒नेम॒ तेऽव॑सा॒ नव्य॑ इन्द्र॒ प्र पू॒रवः॑ स्तवन्त ए॒ना य॒ज्ञैः। स॒प्त यत्पुरः॒ शर्म॒ शार॑दी॒र्दर्द्धन्दासीः॑ पुरु॒कुत्सा॑य॒ शिक्ष॑न् ॥१०॥

स॒नेम॑ । ते । अव॑सा । नव्यः॑ । इ॒न्द्र॒ । प्र । पू॒रवः॑ । स्त॒व॒न्ते॒ । ए॒ना । य॒ज्ञैः । स॒प्त । यत् । पुरः॑ । शर्म॑ । शार॑दीः । दर्त् । हन् । दासीः॑ । पु॒रु॒ऽकुत्सा॑य । शिक्ष॑न् ॥

Mantra without Swara
सनेम तेऽवसा नव्य इन्द्र प्र पूरवः स्तवन्त एना यज्ञैः। सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्दर्द्धन्दासीः पुरुकुत्साय शिक्षन् ॥

सनेम। ते। अवसा। नव्यः। इन्द्र। प्र। पूरवः। स्तवन्ते। एना। यज्ञैः। सप्त। यत्। पुरः। शर्म। शारदीः। दर्त्। हन्। दासीः। पुरुऽकुत्साय। शिक्षन् ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य और सुख के देनेवाले ! (ते) आपके (अवसा) रक्षण आदि से हम लोग (सप्त) सात (पुरः) नगरियों का (सनेम) विभाग करें और जैसे (पूरवः) मनुष्य (एना) इस (अवसा) रक्षण आदि से और (यज्ञैः) श्रेष्ठ व्यवहाररूप यज्ञों से (स्तवन्ते) स्तुति करते हैं इससे (नव्यः) नवीनों में हुए आप उनसे स्तुति करिये और (यत्) जो (शर्म) गृह और (शारदीः) शरत्काल में हुई (दासीः) सेविकाओं को प्राप्त होके (पुरुकुत्साय) बहुत शस्त्रवाले के लिये (शिक्षन्) शिक्षा देता हुआ दुःखों को (प्र, दर्त्) नष्ट करता है और शत्रुओं को (हन्) मारता है, वह सब से सत्कार करने योग्य है ॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे राजा विनय से वर्त्तमान है, वैसे ही सब वर्त्तमान होवें और पुरुषार्थ से सुन्दर पुरों का निर्माण करके उन सब ऋतुओं में सुख देनेवालों में निवास करते हुए दुःखों को दूर फेंकें ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥