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Rigveda Mandal 6 / Sukta 20 / Mantra 1

75 Sukta
13 Mantra
6/20/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- आर्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
द्यौर्न य इ॑न्द्रा॒भि भूमा॒र्यस्त॒स्थौ र॒यिः शव॑सा पृ॒त्सु जना॑न्। तं नः॑ स॒हस्र॑भरमुर्वरा॒सां द॒द्धि सू॑नो सहसो वृत्र॒तुर॑म् ॥१॥

द्यौः । न । यः । इ॒न्द्र॒ । अ॒भि । भूम॑ । अ॒र्यः । त॒स्थौ । र॒यिः । शव॑सा । पृ॒त्ऽसु । जना॑न् । तम् । नः॒ । स॒हस्र॑ऽभरम् । उ॒र्व॒रा॒ऽसाम् । द॒द्धि । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । वृ॒त्र॒ऽतुर॑म् ॥

Mantra without Swara
द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पृत्सु जनान्। तं नः सहस्रभरमुर्वरासां दद्धि सूनो सहसो वृत्रतुरम् ॥

द्यौः। न। यः। इन्द्र। अभि। भूम। अर्यः। तस्थौ। रयिः। शवसा। पृत्ऽसु। जनान्। तम्। नः। सहस्रऽभरम्। उर्वराऽसाम्। दद्धि। सूनो इति। सहसः। वृत्रऽतुरम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहसः) बल से (सूनो) श्रेष्ठ पुत्र (इन्द्र) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त ! (यः) जो (द्यौः) बिजुली वा सूर्य के (न) समान प्रकाशित (रयिः) धन है इस का (अर्यः) स्वामी (शवसा) बल से (पृत्सु) सङ्ग्रामों में (जनान्) मनुष्यों के प्रति (अभि) सम्मुख (तस्थौ) वर्त्तमान होवे (तम्) उस (सहस्रभरम्) असंख्य को धारण करनेवाले (वृत्रतुरम्) जैसे मेघों को, वैसे शत्रुओं को नाश करता है जिससे उस तथा (उर्वरासाम्) बहुत श्रेष्ठ भूमियों में श्रेष्ठ विजय को (नः) हम लोगों के लिये (दद्धि) दीजिये जिससे हम लोग लक्ष्मीवान् (भूम) होवें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य बिजुली के सदृश पराक्रमी और सूर्य के सदृश प्रतापयुक्त हुए सङ्ग्रामों में साहसिक होवें, वे विजयवान् होवें ॥१॥
Subject
अब तेरह ऋचावाले बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को किसकी इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥