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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 9

75 Sukta
11 Mantra
6/2/9
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं त्या चि॒दच्यु॒ताग्ने॑ प॒शुर्न यव॑से। धामा॑ ह॒ यत् ते॑ अजर॒ वना॑ वृ॒श्चन्ति॒ शिक्व॑सः ॥९॥

त्वम् । त्या । चि॒त् । अच्यु॑ता । अग्ने॑ । प॒शुः । न । यव॑से । धाम॑ । ह॒ । यत् । ते॒ । अ॒ज॒र॒ । वना॑ । वृ॒श्चन्ति॑ । शिक्व॑सः ॥

Mantra without Swara
त्वं त्या चिदच्युताग्ने पशुर्न यवसे। धामा ह यत् ते अजर वना वृश्चन्ति शिक्वसः ॥

त्वम्। त्या। चित्। अच्युता। अग्ने। पशुः। न। यवसे। धाम। ह। यत्। ते। अजर। वना। वृश्चन्ति। शिक्वसः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 4

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Meaning
हे (अजर) जरारूप रोग से रहित (अग्ने) विद्वन् ! (यत्) जिन (शिक्वसः) प्रकाशमान (ते) आपके गुण (वना) जङ्गलों को जैसे किरण, वैसे दोषों को (वृश्चन्ति) काटते हैं और (त्या, चित्) उन्हीं (अच्युता) नाश से रहित (धामा) स्थानों को (यवसे) भूसे आदि के लिये (पशुः) गौ आदि पशु (न) जैसे वैसे (त्वम्) आप (ह) निश्चय प्राप्त होते हो ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जिन अध्यापकों को गौओं को जैसे बछड़े प्राप्त होकर दुग्ध के सदृश विद्या को ग्रहण करते हैं और जो विद्वान् जन अग्नि के सदृश दोषों का नाश करते हैं, वे संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं ॥९॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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