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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 8

75 Sukta
11 Mantra
6/2/8
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
क्रत्वा॒ हि द्रोणे॑ अ॒ज्यसेऽग्ने॑ वा॒जी न कृत्व्यः॑। परि॑ज्मेव स्व॒धा गयोऽत्यो॒ न ह्वा॒र्यः शिशुः॑ ॥८॥

क्रत्वा॑ । हि । द्रोणे॑ । अ॒ज्यसे॑ । अग्ने॑ । वा॒जी । न । कृत्व्यः॑ । परि॑ज्माऽइव । स्व॒धा । गयः॑ । अत्यः॑ । न । ह्वा॒र्यः । शिशुः॑ ॥

Mantra without Swara
क्रत्वा हि द्रोणे अज्यसेऽग्ने वाजी न कृत्व्यः। परिज्मेव स्वधा गयोऽत्यो न ह्वार्यः शिशुः ॥

क्रत्वा। हि। द्रोणे। अज्यसे। अग्ने। वाजी। न। कृत्व्यः। परिज्माऽइव। स्वधा। गयः। अत्यः। न। ह्वार्यः। शिशुः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान प्रतापी जन आप (हि) जिस कारण (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (वाजी) वेग से युक्त (न) जैसे वैसे (कृत्व्यः) करने योग्य कर्म्म को (परिज्मेव) सब ओर जानेवाला वह वायु (स्वधा) अन्न (गयः) गृह और (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाला (न) जैसे वैसे (ह्वार्य्यः) कुटिल मार्ग में जाने योग्य (शिशुः) बालक (द्रोणे) जाने योग्य मार्ग में (अज्यसे) प्राप्त किये जाते हो, इस कारण से कृतकृत्य हो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सम्पूर्ण अज्ञ जनों के लिये बुद्धि देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्राप्त कराते हैं और माता-पिता बालक को जैसे वैसे शिक्षा करते हैं, वे अन्न आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥८॥
Subject
फिर विद्वान् को क्या करना चाहिये विषय को कहते हैं ॥

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