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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 7

75 Sukta
11 Mantra
6/2/7
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अधा॒ हि वि॒क्ष्वीड्योऽसि॑ प्रि॒यो नो॒ अति॑थिः। र॒ण्वः पु॒री॑व॒ जूर्यः॑ सू॒नुर्न त्र॑य॒याय्यः॑ ॥७॥

अध॑ । हि । वि॒क्षु । ईड्यः॑ । असि॑ । प्रि॒यः । नः॒ । अति॑थिः । र॒ण्वः । पु॒रिऽइ॑व । जूर्यः॑ । सू॒नुः । न । त्र॒य॒याय्यः॑ ॥

Mantra without Swara
अधा हि विक्ष्वीड्योऽसि प्रियो नो अतिथिः। रण्वः पुरीव जूर्यः सूनुर्न त्रययाय्यः ॥

अध। हि। विक्षु। ईड्यः। असि। प्रियः। नः। अतिथिः। रण्वः। पुरिऽइव। जूर्यः। सूनुः। न। त्रययाय्यः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (हि) जिस कारण से आप (विक्षु) प्रजाओं में (ईड्यः) स्तुति करने के योग्य और (नः) हम लोगों के (प्रियः) कामना करने योग्य (पुरीव) रमणीयपुरी के समान (रण्वः) रमण करता हुआ (जूर्य्यः) जीर्ण (त्रययाय्यः) रक्षक को प्राप्त होनेवाला (सूनुः) सन्तान (न) जैसे वैसे (अतिथिः) नहीं नियत तिथि जिसकी ऐसे (असि) हो, तिससे (अधा) इसके अनन्तर सत्कार करने योग्य हो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे अतिथिजन प्रजाजनों से सत्कार करने योग्य होते और जैसे यहाँ माता और पिता से सन्तान पालन करने योग्य होते हैं, वैसे ही धार्म्मिक विद्वान् जन सत्कार करने योग्य होते हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥