Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 4

75 Sukta
11 Mantra
6/2/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋध॒द्यस्ते॑ सु॒दान॑वे धि॒या मर्तः॑ श॒शम॑ते। ऊ॒ती ष बृ॑ह॒तो दि॒वो द्वि॒षो अंहो॒ न त॑रति ॥४॥

ऋध॑त् । यः । ते॒ । सु॒ऽदान॑वे । धि॒या । मर्तः॑ । श॒शम॑ते । ऊ॒ती । सः । बृ॒ह॒तः । दि॒वः । द्वि॒षः । अंहः॑ । न । त॒र॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
ऋधद्यस्ते सुदानवे धिया मर्तः शशमते। ऊती ष बृहतो दिवो द्विषो अंहो न तरति ॥

ऋधत्। यः। ते। सुऽदानवे। धिया। मर्तः। शशमते। ऊती। सः। बृहतः। दिवः। द्विषः। अंहः। न। तरति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (यः) जो (मर्त्तः) मनुष्य (धिया) बुद्धि से (सुदानवे) उत्तम दान करनेवाले (ते) आपके लिये (ऋधत्) उत्तम प्रकार ऋद्धि करे तथा (शशमते) शान्त हो (सः) वह (ऊती) रक्षण आदि कर्म्म से (बृहतः) बड़े (दिवः) कामना करते हुओं के (द्विषः) शत्रु का (अंहः) अपराध (न) जैसे वैसे (तरति) पार होता है ॥४॥
Essence
जो मनुष्य धर्मात्मा जनों के लिये सुख देनेवाले होवें, वे जैसे धार्मिक जन पाप का नाश करते हैं, वैसे ही शत्रुओं का उल्लङ्घन करते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥