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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 11

75 Sukta
11 Mantra
6/2/11
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अच्छा॑ नो मित्रमहो देव दे॒वानग्ने॒ वोचः॑ सुम॒तिं रोद॑स्योः। वी॒हि स्व॒स्तिं सु॑क्षि॒तिं दि॒वो नॄन्द्वि॒षो अंहां॑सि दुरि॒ता त॑रेम॒ ता त॑रेम॒ तवाव॑सा तरेम ॥११॥

अच्छ॑ । नः॒ । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । दे॒व॒ । दे॒वान् । अग्ने॑ । वोचः॑ । सु॒ऽम॒तिम् । रोद॑स्योः । वी॒हि । स्व॒स्तिम् । सु॒ऽक्षि॒तिम् । दि॒वः । नॄन् । द्वि॒षः । अंहां॑सि । दुः॒ऽइ॒ता । त॒रे॒म॒ । ता । त॒रे॒म॒ । तव॑ । अव॑सा । त॒रे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वोचः सुमतिं रोदस्योः। वीहि स्वस्तिं सुक्षितिं दिवो नॄन्द्विषो अंहांसि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम ॥

अच्छ। नः। मित्रऽमहः। देव। देवान्। अग्ने। वोचः। सुऽमतिम्। रोदस्योः। वीहि। स्वस्तिम्। सुऽक्षितिम्। दिवः। नॄन्। द्विषः। अंहांसि। दुःऽइता। तरेम। ता। तरेम। तव। अवसा। तरेम ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रमहः) मित्र आदर करने योग्य जिसके ऐसे (देव) दान करनेवाले (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान जन ! आप (नः) हम लोगों के (देवान्) विद्वान् दाता जनों को (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि का (अच्छा) उत्तम प्रकार (वोचः) उपदेश करें जिस कारण से (स्वस्तिम्) सुख वा शान्ति तथा (सुक्षितिम्) उत्तम पृथिवी वा उत्तम निवास को (दिवः) कामना करते हुए और (नॄन्) नायक जनों को (वीहि) व्याप्त हूजिये और (द्विषः) द्वेष करनेवालों का त्याग करो तथा (दुरिता) दुःख के प्राप्त करानेवाले (अंहासि) पापों के हम लोग (तरेम) पार होवें (ता) उनको (तरेम) फिर भी पार हों और (तव) आपके (अवसा) रक्षण आदि से (तरेम) पार होवें ॥११॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों को मिल कर और बल को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीत कर दुःखरूप सागर से पार हों ॥११॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह द्वितीय सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वानों के विषय को कहते हैं ॥