Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 10

75 Sukta
11 Mantra
6/2/10
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वेषि॒ ह्य॑ध्वरीय॒तामग्ने॒ होता॒ दमे॑ वि॒शाम्। स॒मृधो॑ विश्पते कृणु जु॒षस्व॑ ह॒व्यम॑ङ्गिरः ॥१०॥

वेषि॑ । हि । अ॒ध्व॒रि॒ऽय॒ताम् । अग्ने॑ । होता॑ । दमे॑ । वि॒शाम् । स॒म्ऽऋधः॑ । वि॒श्प॒ते॒ । कृ॒णु॒ । जु॒षस्व॑ । ह॒व्यम् । अ॒ङ्गि॒रः॒ ॥

Mantra without Swara
वेषि ह्यध्वरीयतामग्ने होता दमे विशाम्। समृधो विश्पते कृणु जुषस्व हव्यमङ्गिरः ॥

वेषि। हि। अध्वरिऽयताम्। अग्ने। होता। दमे। विशाम्। सम्ऽऋधः। विश्पते। कृणु। जुषस्व। हव्यम्। अङ्गिरः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अङ्गिरः) अङ्गों के मध्य में रसरूप (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (विश्पते) प्रजा के स्वामिन् विद्वन् ! जो (हि) जिस कारण से (होता) दाता आप (अध्वरीयताम्) अपने अध्वर की इच्छा करते हुए (विशाम्) प्रजाजनों के (दमे) गृह में (वेषि) व्याप्त होते हो वह आप (समृधः) उत्तम प्रकार से ऋद्धिवाले (कृणु) करिये और (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य का (जुषस्व) सेवन करिये ॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि यज्ञ करनेवालों और प्रजाओं के कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥