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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 1

75 Sukta
11 Mantra
6/2/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं हि क्षैत॑व॒द्यशोऽग्ने॑ मि॒त्रो न पत्य॑से। त्वं वि॑चर्षणे॒ श्रवो॒ वसो॑ पु॒ष्टिं न पु॑ष्यसि ॥१॥

त्वम् । हि । क्षैत॑ऽवत् । यशः॑ । अग्ने॑ । मि॒त्रः । न । पत्य॑से । त्वम् । वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । श्रवः॑ । वसो॒ इति॑ । पु॒ष्टिम् । न । पु॒ष्य॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं हि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे। त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि ॥

त्वम्। हि। क्षैतऽवत्। यशः। अग्ने। मित्रः। न। पत्यसे। त्वम्। विऽचर्षणे। श्रवः। वसो इति। पुष्टिम्। न। पुष्यसि ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विचर्षणे) प्रकाश करनेवाले (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! (हि) जिस कारण (त्वम्) आप (क्षैतवत्) पृथिवी में हुए के समान (यशः) धन अन्न वा कीर्त्ति को (मित्रः) मित्र (न) जैसे वैसे (पत्यसे) पति के सदृश आचरण करते हो और हे (वसो) वसानेवाले ! (त्वम्) आप (पुष्टिम्) धातु के साम्य से बल आदि के योग को (न) जैसे वैसे (श्रवः) अन्न वा श्रवण का (पुष्यसि) पालन करते हो, इससे सुखी होते हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी में उत्पन्न हुए शुष्क वस्तु रस से रहित होते हैं, वैसे विद्यारहित और धर्म्मरहित जन दयारहित और कोमलतारहित होते हैं ॥ २ ॥
Subject
अभ पञ्चमाध्याय का आरम्भ है और छठे मण्डल में ग्यारह ऋचावाले दूसरे सूक्त का आरम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि कैसा होता है, इस विषय को कहते हैं ॥