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Rigveda Mandal 6 / Sukta 19 / Mantra 3

75 Sukta
13 Mantra
6/19/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पृ॒थू क॒रस्ना॑ बहु॒ला गभ॑स्ती अस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि। यू॒थेव॑ प॒श्वः प॑शु॒पा दमू॑ना अ॒स्माँ इ॑न्द्रा॒भ्या व॑वृत्स्वा॒जौ ॥

पृ॒थू इति॑ । क॒रस्ना॑ । ब॒हु॒ला । गभ॑स्ती॒ इति॑ । अ॒स्म॒द्र्य॑क् । सम् । मि॒मी॒हि॒ । श्रवां॑सि । यू॒थाऽइ॑व । प॒श्वः । प॒शु॒ऽपाः । दमू॑नाः । अ॒स्मान् । इ॒न्द्र॒ । अ॒भि । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । आ॒जौ ॥

Mantra without Swara
पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि। यूथेव पश्वः पशुपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ ॥

पृथू इति। करस्ना। बहुला। गभस्ती इति। अस्मद्र्यक्। सम्। मिमीहि। श्रवांसि। यूथाऽइव। पश्वः। पशुऽपाः। दमूनाः। अस्मान्। इन्द्र। अभि। आ। ववृत्स्व। आजौ ॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनवाले और न्याय के ईश ! जो आपके (पृथू) विस्तीर्ण (करस्ना) जो करनेवालों को शुद्ध करनेवाले (बहुला) जिन से बहुतों को ग्रहण करते वे (गभस्ती) दोनों हाथ वर्त्तमान हैं उन दोनों से (पशुपाः) पशुओं के रखनेवाले (पश्वः) पशु के (यूथेव) समूह जैसे वैसे (अस्मद्र्यक्) हम लोगों की सेवा करनेवाले होते हुए (श्रवांसि) अन्नों वा श्रवणों का (सम्, मिमीहि) उत्तम प्रकार ग्रहण करिये और (दमूनाः) इन्द्रियों का निग्रह करनेवाले हुए (आजौ) सङ्ग्राम में (अस्मान्) हम लोगों के (अभि) चारों ओर से (आ, ववृत्स्व) अच्छे प्रकार वर्ताव करिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही लक्ष्मीवान् होते हैं, जो आलस्य का त्याग करके सदा सत्कर्म के लिये प्रयत्न करते हैं और जैसे पशुओं के पालनेवाले पशुओं का पालन करके समृद्ध अर्थात् धनवान् होते हैं, वैसे ही पुरुषार्थी जन दारिद्र्य का विनाश करके धन के स्वामी होते हैं ॥३॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥