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Rigveda Mandal 6 / Sukta 19 / Mantra 2

75 Sukta
13 Mantra
6/19/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑मे॒व धि॒षणा॑ सा॒तये॑ धाद्बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॒ युवा॑नम्। अषा॑ळ्हेन॒ शव॑सा शूशु॒वांसं॑ स॒द्यश्चि॒द्यो वा॑वृ॒धे असा॑मि ॥२॥

इन्द्र॑म् । ए॒व । धि॒षणा॑ । सा॒तये॑ । धा॒त् । बृ॒हन्त॑म् । ऋ॒ष्वम् । अ॒जर॑म् । युवा॑नम् । अषा॑ळ्हेन । शव॑सा । शू॒सु॒ऽवांस॑म् । स॒द्यः । चि॒त् । यः । व॒वृ॒धे । असा॑मि ॥

Mantra without Swara
इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्। अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि ॥

इन्द्रम्। एव। धिषणा। सातये। धात्। बृहन्तम्। ऋष्वम्। अजरम्। युवानम्। अषाळ्हेन। शवसा। शूसुऽवांसम्। सद्यः। चित्। यः। ववृधे। असामि ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 2

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Meaning
(यः) जो (धिषणा) बुद्धि वा कर्म से (सातये) संविभाग के लिये (बृहन्तम्) पृथिवी के समीप से अतिविस्तीर्ण (ऋष्वम्) जानेवाले (अजरम्) वृद्धावस्था से रहित (युवानम्) युवाजन को जैसे वैसे (अषाळ्हेन) शत्रुओं से नहीं सहने योग्य (शवसा) बल से (शूशुवांसम्) व्याप्तिमान् (इन्द्रम्) सूर्य के सदृश अत्यन्त ऐश्वर्यवाले को (धात्) धारण करता है वह (एव) ही (सद्यः) शीघ्र (असामि) अत्यन्त (चित्) निश्चित (वावृधे) वृद्धि की प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
जैसे बड़े मित्र को प्राप्त होकर मनुष्य वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसे ही बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर अतुल वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥२॥
Subject
मनुष्यों को किस प्रकार से उन्नति करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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