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Rigveda Mandal 6 / Sukta 19 / Mantra 12

75 Sukta
13 Mantra
6/19/12
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जनं॑ वज्रि॒न्महि॑ चि॒न्मन्य॑मानमे॒भ्यो नृभ्यो॑ रन्धया॒ येष्वस्मि॑। अधा॒ हि त्वा॑ पृथि॒व्यां शूर॑सातौ॒ हवा॑महे॒ तन॑ये॒ गोष्व॒प्सु ॥१२॥

जन॑म् । व॒ज्रि॒न् । महि॑ । चि॒त् । मन्य॑मानम् । ए॒भ्यः । नृऽभ्यः॑ । र॒न्ध॒य॒ । येषु॑ । अस्मि॑ । अध॑ । हि । त्वा॒ । पृ॒थि॒व्याम् । शूर॑ऽसातौ । हवा॑महे । तन॑ये । गोषु॑ । अ॒प्ऽसु ॥

Mantra without Swara
जनं वज्रिन्महि चिन्मन्यमानमेभ्यो नृभ्यो रन्धया येष्वस्मि। अधा हि त्वा पृथिव्यां शूरसातौ हवामहे तनये गोष्वप्सु ॥

जनम्। वज्रिन्। महि। चित्। मन्यमानम्। एभ्यः। नृऽभ्यः। रन्धय। येषु। अस्मि। अध। हि। त्वा। पृथिव्याम्। शूरऽसातौ। हवामहे। तनये। गोषु। अप्ऽसु ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 8 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) अच्छे शस्त्र और अस्त्र के धारण करनेवाले राजन् ! आप (एभ्यः) इन (नृभ्यः) उत्तम प्रकार शिक्षित अग्रणी मनुष्यों के लिये उस (महि) महान् (मन्यमानम्) अभिमान करनेवाले (जनम्) मनुष्य का (रन्धया) नाश करिये और (अधा) इसके अनन्तर (येषु) जिनके निमित्त (शूरसातौ) शूरवीर विभक्त होते हैं जिस संग्राम में उसमें (अस्मि) हूँ उसकी रक्षा कीजिये (हि) जिससे (पृथिव्याम्) विस्तीर्ण भूमि में (गोषु) पृथिवियों वा धनों में और (अप्सु) जलों वा प्राणों में (तनये) सन्तान के लिये जिन (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते हैं, वह आप (चित्) भी हम लोगों का सत्कार कीजिये ॥१२॥
Essence
हे राजसम्बन्धी जनो ! जो मिथ्या अभिमान करनेवाला जन श्रेष्ठ पुरुषों को पीड़ा देवे, उसको दण्ड दीजिये और युद्धविद्या से सम्पूर्ण जनों का रक्षण करिये, जिससे भूमि में आप लोगों की प्रशंसा प्रसिद्ध होवे ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥