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Rigveda Mandal 6 / Sukta 19 / Mantra 10

75 Sukta
13 Mantra
6/19/10
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नृ॒वत्त॑ इन्द्र॒ नृत॑माभिरू॒ती वं॑सी॒महि॑ वा॒मं श्रोम॑तेभिः। ईक्षे॒ हि वस्व॑ उ॒भय॑स्य राज॒न्धा रत्नं॒ महि॑ स्थू॒रं बृ॒हन्त॑म् ॥

नृ॒ऽवत् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । नृऽत॑माभिः । ऊ॒ती । वं॒सी॒महि॑ । वा॒मम् । श्रोम॑तेभिः । ईक्षे॑ । हि । वस्वः॑ । उ॒भय॑स्य । रा॒ज॒न् । धाः । रत्न॑म् । महि॑ । स्थू॒रम् । बृ॒हन्त॑म् ॥

Mantra without Swara
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः। ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्धा रत्नं महि स्थूरं बृहन्तम् ॥

नृऽवत्। ते। इन्द्र। नृऽतमाभिः। ऊती। वंसीमहि। वामम्। श्रोमतेभिः। ईक्षे। हि। वस्वः। उभयस्य। राजन्। धाः। रत्नम्। महि। स्थूरम्। बृहन्तम् ॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 8 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले (राजन्) विद्या और विनय से प्रकाशमान ! जैसे हम लोग (ते) आपके (नृतमाभिः) अति उत्तम मनुष्य विद्यमान जिनमें उन (ऊती) रक्षण आदिकों से (नृवत्) मनुष्यों के तुल्य (वामम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म का (वंसीमहि) विभाग करें और (श्रोमतेभिः) सुनाने योग्य वचनों से (उभयस्य) दोनों राजा और प्रजा में वर्त्तमान (वस्वः) धन का मैं (ईक्षे) दर्शन करता हूँ, वैसे आप (बृहन्तम्) बड़े (महि) आदर करने योग्य (स्थूरम्) स्थिर (रत्नम्) सुन्दर धन को (हि) ही (धाः) धारण करिये ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजजनों तथा प्रजाजनों और राजा को चाहिये कि प्रशस्तों से प्रशंसित विद्या और बहुत धन की निरन्तर वृद्धि करें ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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