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Rigveda Mandal 6 / Sukta 19 / Mantra 1

75 Sukta
13 Mantra
6/19/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒हाँ इन्द्रो॑ नृ॒वदा च॑र्षणि॒प्रा उ॒त द्वि॒बर्हा॑ अमि॒नः सहो॑भिः। अ॒स्म॒द्र्य॑ग्वावृधे वी॒र्या॑यो॒रुः पृ॒थुः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत् ॥१॥

म॒हान् । इन्द्रः॑ । नृ॒ऽवत् । आ । च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः । उ॒त । द्वि॒ऽबर्हाः॑ । अ॒मि॒नः । सहः॑ऽभिः । अ॒स्म॒द्र्य॑क् । व॒वृ॒धे॒ । वी॒र्या॑य । उ॒रुः । पृ॒थुः । सुऽकृ॑तः । क॒र्तृऽभिः॑ । भू॒त् ॥

Mantra without Swara
महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः। अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् ॥

महान्। इन्द्रः। नृऽवत्। आ। चर्षणिऽप्राः। उत। द्विऽबर्हाः। अमिनः। सहःऽभिः। अस्मद्र्यक्। ववृधे। वीर्याय। उरुः। पृथुः। सुऽकृतः। कर्तृऽभिः। भूत् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (महान्) बड़ा (इन्द्रः) सूर्य (चर्षणिप्राः) मनुष्यों में बिजुली रूप में व्याप्त होने (उत) और (द्विबर्हाः) अन्तरिक्ष और वायु से बढ़ने और (अमिनः) नहीं हिंसा करनेवाला (अस्मद्र्यक्) हम लोगों के सम्मुख हुआ (उरुः) बहुत (पृथुः) विस्तीर्ण (सुकृतः) उत्तम प्रकार उत्पन्न किया गया (भूत्) हो तथा (सहोभिः) बलों और (कर्तृभिः) कर्म करनेवालों के साथ (वीर्याय) पराक्रम के लिये (नृवत्) मनुष्य जैसे वैसे (आ, वावृधे) सब ओर से बढ़ता है, उसको जान कर इष्टसिद्धि करिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मित्र-मित्र के साथ कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करता है, वैसे ही ईश्वर से निर्मित बिजुली वा सूर्य सम्पूर्ण कर्मकारियों का सहयोगी होता है ॥१॥
Subject
अब तेरह ऋचावाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब सूर्य कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥