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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 9

75 Sukta
15 Mantra
6/18/9
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒दाव॑ता॒ त्वक्ष॑सा॒ पन्य॑सा च वृत्र॒हत्या॑य॒ रथ॑मिन्द्र तिष्ठ। धि॒ष्व वज्रं॒ हस्त॒ आ द॑क्षिण॒त्राभि प्र म॑न्द पुरुदत्र मा॒याः ॥९॥

उ॒त्ऽअव॑ता । त्वक्ष॑सा । पन्य॑सा । च॒ । वृ॒त्र॒ऽहत्या॑य । रथ॑म् । इ॒न्द्र॒ । ति॒ष्ठ॒ । धि॒ष्व । वज्र॑म् । हस्ते॑ । आ । द॒क्षि॒ण॒ऽत्रा । अ॒भि । प्र । म॒न्द॒ । पु॒रु॒ऽद॒त्र॒ । मा॒याः ॥

Mantra without Swara
उदावता त्वक्षसा पन्यसा च वृत्रहत्याय रथमिन्द्र तिष्ठ। धिष्व वज्रं हस्त आ दक्षिणत्राभि प्र मन्द पुरुदत्र मायाः ॥

उत्ऽअवता। त्वक्षसा। पन्यसा। च। वृत्रऽहत्याय। रथम्। इन्द्र। तिष्ठ। धिष्व। वज्रम्। हस्ते। आ। दक्षिणऽत्रा। अभि। प्र। मन्द। पुरुऽदत्र। मायाः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे (पुरुदत्र) बहुत दान करनेवाले (इन्द्र) राजन् ! आप (उदावता) ऊर्ध्वगमन और (पन्यसा) शुद्ध व्यवहार तथा (त्वक्षसा) सूक्ष्मीकरण से (वृत्रहत्याय) संग्राम के लिये (रथम्) रथ पर (आ) सब प्रकार से (तिष्ठ) स्थित हो और (दक्षिणत्रा) दाहिने (हस्ते) हाथ में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को (धिष्व) धारण करिये (मायाः) बुद्धियों को (च) और प्राप्त होकर (अभि, प्र, मन्द) सब प्रकार से प्रशंसा करिये ॥९॥
Essence
जो उत्कृष्टता से सम्पूर्ण विषयों को जाननेवाली बुद्धियों को प्राप्त होकर शस्त्र और अस्त्रों को धारण करके युद्ध के लिये जाते हैं, वे विजय को प्राप्त होते हैं ॥९॥
Subject
फिर राजजन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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