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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 8

75 Sukta
15 Mantra
6/18/8
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स यो न मु॒हे न मिथू॒ जनो॒ भूत्सु॒मन्तु॑नामा॒ चुमु॑रिं॒ धुनिं॑ च। वृ॒णक्पिप्रुं॒ शम्ब॑रं॒ शुष्ण॒मिन्द्रः॑ पु॒रां च्यौ॒त्नाय॑ श॒यथा॑य॒ नू चि॑त् ॥८॥

सः । यः । न । मु॒हे । न । मिथु॑ । जनः॑ । भूत् । सु॒मन्तु॑ऽनामा । चुमु॑रिम् । धुनि॑म् । च॒ । वृ॒णक् । पिप्रु॑म् । शम्ब॑रम् । शुष्ण॑म् । इन्द्रः॑ । पु॒राम् । च्यौ॒त्नाय॑ । श॒यथा॑य । नु । चि॒त् ॥

Mantra without Swara
स यो न मुहे न मिथू जनो भूत्सुमन्तुनामा चुमुरिं धुनिं च। वृणक्पिप्रुं शम्बरं शुष्णमिन्द्रः पुरां च्यौत्नाय शयथाय नू चित् ॥

सः। यः। न। मुहे। न। मिथु। जनः। भूत्। सुमन्तुऽनामा। चुमुरिम्। धुनिम्। च। वृणक्। पिप्रुम्। शम्बरम्। शुष्णम्। इन्द्रः। पुराम्। च्यौत्नाय। शयथाय। नु। चित् ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (चुमुरिम्) भोजन करने (प्रिपुम्) व्याप्त होने (धुनिम्) शब्द करने (शुष्णम्) सुखाने और (शम्बरम्) सुख को स्वीकार करानेवाले मेघ को (पुराम्) पूर्ण धनों के (च्यौत्नाय) गमन और (शयथाय) शयन के लिये (नू) शीघ्र (वृणक्) काटता है, वैसे (च) और (यः) जो (सुमन्तुनामा) उत्तम प्रकार जानने योग्य नाम जिसका वह (जनः) मनुष्य (न) नहीं (मुहे) मोह को प्राप्त होता और (न)(मिथू) परस्पर (भूत्) होता है (सः) वह (चित्) भी सत्कार करने योग्य है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का निर्म्माण करके और वर्षाय के =बरसा कर बद्ध नहीं होता है, वैसे ही मनुष्य धर्म्मयुक्त कार्य्यों को करके सज्जनों के साथ वर्त्ताव करके मोहित नहीं होते, किन्तु सुखी होते हैं ॥८॥
Subject
फिर मनुष्य कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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