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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 15

75 Sukta
15 Mantra
6/18/15
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी तत्त॒ ओजोऽम॑र्त्या जिहत इन्द्र दे॒वाः। कृ॒ष्वा कृ॑त्नो॒ अकृ॑तं॒ यत्ते॒ अस्त्यु॒क्थं नवी॑यो जनयस्व य॒ज्ञैः ॥१५॥

अनु॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । तत् । ते॒ । ओजः॑ । अम॑र्त्याः । जि॒ह॒ते॒ । इ॒न्द्र॒ । दे॒वाः । कृ॒ष्व । कृ॒त्नो॒ इति॑ । अकृ॑तम् । यत् । ते॒ । अस्ति॑ । उ॒क्थम् । नवी॑यः । ज॒न॒य॒स्व॒ । य॒ज्ञैः ॥

Mantra without Swara
अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः। कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः ॥

अनु। द्यावापृथिवी इति। तत्। ते। ओजः। अमर्त्याः। जिहते। इन्द्र। देवाः। कृष्व। कृत्नो इति। अकृतम्। यत्। ते। अस्ति। उक्थम्। नवीयः। जनयस्व। यज्ञैः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कृत्नो) करनेवाले (इन्द्र) राजन् ! (ते) आपके समीप से जो (अमर्त्याः) साधारण मनुष्यों के स्वभाव से विलक्षण स्वभाववाले (देवाः) विद्वान् जन (यत्) जो (अकृतम्) नहीं किया गया कर्म और (नवीयः) अतिशय नवीन वचन (उक्थम्) कहने योग्य (अस्ति) है (तत्) उस (ते) आपके वचन को (जिहते) प्राप्त होते और (द्यावापृथिवी) भूमि और सूर्य को (अनु) पश्चात् प्राप्त होते हैं उनको आप (यज्ञैः) मेल करनेरूप व्यवहारों से (जनयस्व) प्रकट कीजिये और (ओजः) पराक्रम को (कृष्वा) करिये ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग भूमि और बिजुली आदि की विद्या से नवीन-नवीन कार्य को सिद्ध करिये ॥१५॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अठारहवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥