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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 14

75 Sukta
15 Mantra
6/18/14
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॒ त्वाहि॑घ्ने॒ अध॑ देव दे॒वा मद॒न्विश्वे॑ क॒वित॑मं कवी॒नाम्। करो॒ यत्र॒ वरि॑वो बाधि॒ताय॑ दि॒वे जना॑य त॒न्वे॑ गृणा॒नः ॥१४॥

अनु॑ । त्वा॒ । अहि॑ऽघ्ने । अध॑ । दे॒व॒ । दे॒वाः । मद॑न् । विश्वे॑ । क॒विऽत॑मम् । क॒वी॒नाम् । करः॑ । यत्र॑ । वरि॑वः । बा॒धि॒ताय॑ । दि॒वे । जना॑य । त॒न्वे॑ । गृ॒णा॒नः ॥

Mantra without Swara
अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्। करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः ॥

अनु। त्वा। अहिऽघ्ने। अध। देव। देवाः। मदन्। विश्वे। कविऽतमम्। कवीनाम्। करः। यत्र। वरिवः। बाधिताय। दिवे। जनाय। तन्वे। गृणानः ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) विद्वन् ! (यत्र) जहाँ (बाधिताय) विलोडित हुए (दिवे) कामना करते हुए (जनाय) जनके और (तन्वे) शरीर के लिये (वरिवः) सेवन की (गृणानः) स्तुति करता हुआ जन (करः) कार्य्यों को करनेवाला है वहाँ (अहिघ्ने) मेघ को नष्ट करनेवाले सूर्य के लिये जैसे वैसे जिस (कवीनाम्) विद्वानों के मध्य में (कवितमम्) अत्यन्त विद्वान् (त्वा) आपको (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् जन (अनु, मदन्) आनन्दित करते हैं, उन आप का आश्रयण करके (अध) इसके अनन्तर निरन्तर हम लोग सुखी होवें ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम, यथार्थवक्ता, विद्वानों का उत्तम प्रकार सेवन कर विद्याओं को प्राप्त होकर अन्यों को जानते हैं, वे प्रसन्न होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥