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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 12

75 Sukta
15 Mantra
6/18/12
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र तु॑विद्यु॒म्नस्य॒ स्थवि॑रस्य॒ घृष्वे॑र्दि॒वो र॑रप्शे महि॒मा पृ॑थि॒व्याः। नास्य॒ शत्रु॒र्न प्र॑ति॒मान॑मस्ति॒ न प्र॑ति॒ष्ठिः पु॑रुमा॒यस्य॒ सह्योः॑ ॥१२॥

प्र । तु॒वि॒ऽद्यु॒म्नस्य॑ । स्थवि॑रस्य । घृष्वेः॑ । दि॒वः । र॒र॒प्शे॒ । म॒हि॒मा । पृ॒थि॒व्याः । न । अ॒स्य॒ । शत्रुः॑ । न । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । अ॒स्ति॒ । न । प्र॒ति॒ऽस्थिः । पु॒रु॒ऽमा॒यस्य॑ । सह्योः॑ ॥

Mantra without Swara
प्र तुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घृष्वेर्दिवो ररप्शे महिमा पृथिव्याः। नास्य शत्रुर्न प्रतिमानमस्ति न प्रतिष्ठिः पुरुमायस्य सह्योः ॥

प्र। तुविऽद्युम्नस्य। स्थविरस्य। घृष्वेः। दिवः। ररप्शे। महिमा। पृथिव्याः। न। अस्य। शत्रुः। न। प्रतिऽमानम्। अस्ति। न। प्रतिऽस्थिः। पुरुऽमायस्य। सह्योः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (तुविद्युम्नस्य) बहुत प्रशंसारूप धन से युक्त (स्थविरस्य) विद्या और अवस्था से वृद्ध (घृष्वेः) दुष्टों के घिसनेवाले (दिवः) सुन्दर (पुरुमायस्य) बहुत श्रेष्ठ कर्म्मों में बुद्धि जिसकी उस (सह्योः) सहनशील का (महिमा) महत्त्व (पृथिव्याः) भूमि से (प्र, ररप्शे) अलग फैलता है (अस्य) इसका (न)(शत्रुः) वैरी (न)(प्रतिमानम्) मान वा सादृश्य और (न)(प्रतिष्ठिः) प्रतिष्ठित (अस्ति) है ॥१२॥
Essence
जो विद्या में वृद्ध, अमित प्रशंसा और महिमावाले, सत्य की कामना करते हुए, बहुत बुद्धिमान् और शम, दम आदि गुणों से युक्त होवें, उनका कोई भी न शत्रु, न बराबर और न उनसे अधिक प्रतिष्ठित होता है ॥१२॥
Subject
फिर कौन अजातशत्रुवाला होता है, इस विषय को कहते हैं ॥