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Rigveda Mandal 6 / Sukta 18 / Mantra 11

75 Sukta
15 Mantra
6/18/11
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ स॒हस्रं॑ प॒थिभि॑रिन्द्र रा॒या तुवि॑द्युम्न तुवि॒वाजे॑भिर॒र्वाक्। या॒हि सू॑नो सहसो॒ यस्य॒ नू चि॒ददे॑व॒ ईशे॑ पुरुहूत॒ योतोः॑ ॥११॥

आ । स॒हस्र॑म् । प॒थिऽभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । रा॒या । तुवि॑ऽद्युम्न । तु॒वि॒ऽवाजे॑भिः । अ॒र्वाक् । या॒हि । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । यस्य॑ । नु । चि॒त् । अदे॑वः । ईशे॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । योतोः॑ ॥

Mantra without Swara
आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक्। याहि सूनो सहसो यस्य नू चिददेव ईशे पुरुहूत योतोः ॥

आ। सहस्रम्। पथिऽभिः। इन्द्र। राया। तुविऽद्युम्न। तुविऽवाजेभिः। अर्वाक्। याहि। सूनो इति। सहसः। यस्य। नु। चित्। अदेवः। ईशे। पुरुऽहूत। योतोः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 1

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Meaning
हे (तुविद्युम्न) बहुत प्रशंसा से युक्त (पुरुहूत) बहुतों से आह्वान किये गये (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र (इन्द्र) दुष्टता के नाशक राजन् ! आप (पथिभिः) मार्गों (राया) धन और (तुविवाजेभिः) बहुत वेग वा बहुत संग्रामों के साथ (अर्वाक्) पीछे से (सहस्रम्) अनेकों को (आ) सब ओर से (याहि) प्राप्त हूजिये और (यस्य) जिस (योतोः) मिश्रित और अमिश्रित करनेवाले का (चित्) भी (अदेवः) विद्वान् से भिन्न जन (ईशे) इच्छा करता है, उसको (नू) शीघ्र प्राप्त होओ ॥११॥
Essence
हे राजन् ! आप विद्या और विनय के मार्ग से प्रजाओं का पिता के सदृश पालन करके यशस्वी होकर सत्य और असत्य का यथावत् निर्णय करिये ॥११॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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