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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 7

75 Sukta
15 Mantra
6/17/7
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प॒प्राथ॒ क्षां महि॒ दंसो॒ व्यु१॒॑र्वीमुप॒ द्यामृ॒ष्वो बृ॒हदि॑न्द्र स्तभायः। अधा॑रयो॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे प्र॒त्ने मा॒तरा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ ॥७॥

प॒प्राथ॑ । क्षाम् । महि॑ । दंसः॑ । वि । उ॒र्वीम् । उप॑ । द्याम् । ऋ॒ष्वः । बृ॒हत् । इ॒न्द्र॒ । स्त॒भा॒यः॒ । अधा॑रयः । रोद॑सी॒ इति॑ । दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे । प्र॒त्ने इति॑ । मा॒तरा॑ । य॒ह्वी इति॑ । ऋ॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
पप्राथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यामृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः। अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य ॥

पप्राथ। क्षाम्। महि। दंसः। वि। उर्वीम्। उप। द्याम्। ऋष्वः। बृहत्। इन्द्र। स्तभायः। अधारयः। रोदसी इति। देवपुत्रे इति देवऽपुत्रे। प्रत्ने इति। मातरा। यह्वी इति। ऋतस्य ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश ऐश्वर्य्य करनेवाले ! जैसे सूर्य्य (महि) बड़े (दंसः) कर्म्म को (उर्वीम्) विस्तृत (क्षाम्) भूमि को और (द्याम्) प्रकाश को (वि, उप, पप्राथ) विशेष कर समीप में पूरित करता है और (ऋष्वः) बड़ा महात्मा जन (बृहत्) बड़े को (स्तभाय) स्तम्भित करता है, वैसे आप पूरित कीजिये और जैसे यह सूर्य्य (ऋतस्य) सत्य कारण के समीप से प्रकट हुए (देवपुत्रे) विद्वानों के पुत्र के समान वर्त्तमान (प्रत्ने) प्राचीन (मातरा) माता के सदृश आदर करनेवाले (यह्वी) बड़े (रोदसी) भूमि और सूर्य्य लोक को धारण करता है, वैसे आप (अधारयः) धारण करते हो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य भूगोलों को धारण करके पिता के सदृश सम्पूर्ण प्रजाओं का पालन करता है, वैसे ही आप लोग यहाँ वर्त्ताव करो ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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