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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 3

75 Sukta
15 Mantra
6/17/3
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा पा॑हि प्र॒त्नथा॒ मन्द॑तु त्वा श्रु॒धि ब्रह्म॑ वावृ॒धस्वो॒त गी॒र्भिः। आ॒विः सूर्यं॑ कृणु॒हि पी॑पि॒हीषो॑ ज॒हि शत्रूँ॑र॒भि गा इ॑न्द्र तृन्धि ॥३॥

ए॒व । पा॒हि॒ । प्र॒त्नऽथा॑ । मन्द॑तु । त्वा॒ । श्रु॒धि । ब्रह्म॑ । व॒वृ॒धस्व॑ । उ॒त । गीः॒ऽभिः । आ॒विः । सूर्य॑म् । कृ॒णु॒हि । पी॒पि॒हीषः॑ । ज॒हि । शत्रू॑न् । अ॒भि । गाः । इ॒न्द्र॒ । तृ॒न्धि॒ ॥

Mantra without Swara
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः। आविः सूर्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि ॥

एव। पाहि। प्रत्नऽथा। मन्दतु। त्वा। श्रुधि। ब्रह्म। ववृधस्व। उत। गीःऽभिः। आविः। सूर्यम्। कृणुहि। पीपिहीषः। जहि। शत्रून्। अभि। गाः। इन्द्र। तृन्धि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करनेवाले ! (प्रत्नथा) प्राचीन जन जैसे वैसे आप (ब्रह्म) वेद की (पाहि) रक्षा कीजिये और जो वेद (त्वा) आपकी (मन्दतु) प्रशंसा करे, उसको आप (श्रुधि) सुनिये उससे (वावृधस्व) बढ़िये और (उत) भी (गीर्भिः) वाणियों से (सूर्य्यम्) परमेश्वर का (आविः) प्राकट्य (कृणुहि) करिये तथा (इषः) अन्न का (पीपिहि) पान करिये और (शत्रून्) शत्रुओं का (अभि, तृन्धि) सब प्रकार से नाश करिये और दोषों का (जहि) त्याग करिये और (गाः) पृथिवियों को (एवा) ही प्राप्त हूजिये ॥३॥
Essence
जो श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करके विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं, वे जगत् के प्रिय होते हैं ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥