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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 13

75 Sukta
15 Mantra
6/17/13
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वा ता विश्वा॑ चकृ॒वांस॒मिन्द्रं॑ म॒हामु॒ग्रम॑जु॒र्यं स॑हो॒दाम्। सु॒वीरं॑ त्वा स्वायु॒धं सु॒वज्र॒मा ब्रह्म॒ नव्य॒मव॑से ववृत्यात् ॥१३॥

ए॒व । ता । विश्वा॑ । च॒कृ॒ऽवांस॑म् । इन्द्र॑म् । म॒हाम् । उ॒ग्रम् । अ॒जु॒र्यम् । स॒हः॒ऽदाम् । सु॒ऽवीर॑म् । त्वा॒ । सु॒ऽआ॒यु॒धम् । सु॒ऽवज्र॑म् । आ । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । अव॑से । व॒वृ॒त्या॒त् ॥

Mantra without Swara
एवा ता विश्वा चकृवांसमिन्द्रं महामुग्रमजुर्यं सहोदाम्। सुवीरं त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे ववृत्यात् ॥

एव। ता। विश्वा। चकृऽवांसम्। इन्द्रम्। महाम्। उग्रम्। अजुर्यम्। सहःऽदाम्। सुऽवीरम्। त्वा। सुऽआयुधम्। सुऽवज्रम्। आ। ब्रह्म। नव्यम्। अवसे। ववृत्यात् ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो (ता) उन (विश्वा) सम्पूर्णों को और (चकृवांसम्) करते हुए (महाम्) बड़े (उग्रम्) तेजस्वी (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण हुए (सहोदाम्) बल के देनेवाले (स्वायुधम्) उत्तम शस्त्र के चलाने में चतुर (सुवज्रम्) प्रशस्त वज्ररूप अस्त्र के चलाने में समर्थ (सुवीरम्) उत्तमवीरों से युक्त (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले शत्रु के नाशक (त्वा) आपको (एवा) ही (अवसे) रक्षण आदि के लिये और न्याय करने के लिये (आ, ववृत्यात्) सब ओर से वर्त्ताव करे वह (नव्यम्) नवीनों में हुए (ब्रह्म) बड़े धन वा अन्न को बढ़ाने को समर्थ होवे ॥१३॥
Essence
पिता के सदृश प्रजाओं के पालन, धनुर्वेद, राजनीति और युद्धविद्या में कुशल राजा की सब लोग वृद्धि करें और इन लोगों की यह राजा निरन्तर वृद्धि करे ॥१३॥
Subject
फिर राजा और प्रजाजन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥