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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 12

75 Sukta
15 Mantra
6/17/12
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ क्षोदो॒ महि॑ वृ॒तं न॒दीनां॒ परि॑ष्ठितमसृज ऊ॒र्मिम॒पाम्। तासा॒मनु॑ प्र॒वत॑ इन्द्र॒ पन्थां॒ प्रार्द॑यो॒ नीची॑र॒पसः॑ समु॒द्रम् ॥१२॥

आ । क्षोदः॑ । महि॑ । वृ॒तम् । न॒दीना॑म् । परि॑ऽस्थितम् । अ॒सृ॒जः॒ । ऊ॒र्मिम् । अ॒पाम् । तासा॑म् । अनु॑ । प्र॒ऽवतः॑ । इ॒न्द्र॒ । पन्था॑म् । प्र । आ॒र्द॒यः॒ । नीचीः॑ । अ॒पसः॑ । स॒मु॒द्रम् ॥

Mantra without Swara
आ क्षोदो महि वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम्। तासामनु प्रवत इन्द्र पन्थां प्रार्दयो नीचीरपसः समुद्रम् ॥

आ। क्षोदः। महि। वृतम्। नदीनाम्। परिऽस्थितम्। असृजः। ऊर्मिम्। अपाम्। तासाम्। अनु। प्रऽवतः। इन्द्र। पन्थाम्। प्र। आर्दयः। नीचीः। अपसः। समुद्रम् ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के समान वर्त्तमान राजन् ! जैसे सूर्य्य (नदीनाम्) नदियों के (महि) बड़े (वृतम्) स्वीकार किये गये (परिष्ठितम्) सब ओर से वर्त्तमान (क्षोदः) जल की और (अपाम्) जलों की (ऊर्मिम्) तरंग को (असृजः) उत्पन्न करता (तासाम्) उनके (प्रवतः) नीचे स्थान से (अनु) पश्चात् (पन्थाम्) मार्ग को (अपसः) कर्म्म की (नीचीः) निचली भूमियों को और (समुद्रम्) अन्तरिक्ष वा बड़े समुद्र को (प्र, आ, आर्दयः) प्राप्त कराता है, वैसे आप सेना और प्रजा को सुख प्राप्त करा के शत्रुओं को नीची दशा को प्राप्त कराइये ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान हैं, वे प्रजापालन और शत्रु के निवारण करने को समर्थ होते हैं ॥१२॥
Subject
अब राजा आदि क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥