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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 10

75 Sukta
15 Mantra
6/17/10
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॒ त्वष्टा॑ ते म॒ह उ॑ग्र॒ वज्रं॑ स॒हस्र॑भृष्टिं ववृतच्छ॒ताश्रि॑म्। निका॑मम॒रम॑णसं॒ येन॒ नव॑न्त॒महिं॒ सं पि॑णगृजीषिन् ॥१०॥

अध॑ । त्वष्टा॑ । ते॒ । म॒हः । उ॒ग्र॒ । वज्र॑म् । स॒हस्र॑ऽभृष्टिम् । व॒वृ॒त॒त् । श॒तऽअ॑श्रिम् । निऽका॑मम् । अ॒रऽम॑नसम् । येन॑ । नव॑न्तम् । अहि॑म् । सम् । पि॒ण॒क् । ऋ॒जी॒षि॒न् ॥

Mantra without Swara
अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृतच्छताश्रिम्। निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणगृजीषिन् ॥

अध। त्वष्टा। ते। महः। उग्र। वज्रम्। सहस्रऽभृष्टिम्। ववृतत्। शतऽअश्रिम्। निऽकामम्। अरऽमनसम्। येन। नवन्तम्। अहिम्। सम्। पिणक्। ऋजीषिन् ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋजीषिन्) सरल स्वाभाववाले (उग्र) तेजस्विन् ! (ते) आपके हस्त में (महः) बड़े (सहस्रभृष्टिम्) हजारों का छेदन करने और (शताश्रिम्) सैकड़ों का आश्रयण करनेवाले और (निकामम्) नित्य कामना किये जाते (अरमणसम्) जिसमें नहीं रमते हैं शत्रु उस (वज्रम्) शस्त्रविशेष को धारण कराता हूँ (अध) इसके अनन्तर (येन) जिससे (त्वष्टा) छेदन करनेवाले आप (नवन्तम्) स्तुति करते हुए नम्र के सदृश को (अहिम्) मेघ को जैसे सूर्य्य, वैसे (सम्, पिणक्) अच्छे प्रकार पीसते हैं तथा (ववृतत्) वर्त्ताव करते हैं, उन आपको हम लोग भी धारण करें ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे वीरपुरुषो ! जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले वीरपुरुष शस्त्रों को धारण करें, वैसे आप लोग भी धारण करो ॥१०॥
Subject
अब राजपुरुष कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥