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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 1

75 Sukta
15 Mantra
6/17/1
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पिबा॒ सोम॑म॒भि यमु॑ग्र॒ तर्द॑ ऊ॒र्वं गव्यं॒ महि॑ गृणा॒न इ॑न्द्र। वि यो धृ॑ष्णो॒ वधि॑षो वज्रहस्त॒ विश्वा॑ वृ॒त्रम॑मि॒त्रिया॒ शवो॑भिः ॥१॥

पिब॑ । सोम॑म् । अ॒भि । यम् । उ॒ग्र॒ । तर्दः॑ । ऊ॒र्वम् । गव्य॑म् । महि॑ । गृ॒णा॒नः । इ॒न्द्र॒ । वि । यः । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । वधि॑षः । व॒ज्र॒ऽह॒स्त॒ । विश्वा॑ । वृ॒त्रम् । अ॒मि॒त्रिया॑ । शवः॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र। वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः ॥

पिब। सोमम्। अभि। यम्। उग्र। तर्दः। ऊर्वम्। गव्यम्। महि। गृणानः। इन्द्र। वि। यः। धृष्णो इति। वधिषः। वज्रऽहस्त। विश्वा। वृत्रम्। अमित्रिया। शवःऽभिः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (व्रजहस्त) शस्त्र है हस्त में जिनके ऐसे (धृष्णो) अत्यन्त दृढ़ (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले ! (यः) जो (शवोभिः) बलों से (वृत्रम्) मेघों को सूर्य्य जैसे वैसे (विश्वा) सम्पूर्ण (अमित्रिया) शत्रुओं को आप (वि) विशेष करके (वधिषः) नाश करिये और हे (उग्र) तेजस्विन् (महि) बड़े (गव्यम्) गौओं के घृत की (गृणानः) स्तुति करते हुए (यम्) जिस (ऊर्वम्) हिंसा करने योग्य की (अभि) (तर्दः) हिंसा करिये, उसके सम्बन्ध में वह आप (सोमम्) महौषधि के रस (पिबा) पीजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य, विद्या और सत्कर्म्म से दुष्टों को दूर करके श्रेष्ठों को स्वीकार करते हैं, वे शत्रुओं का नाश करते हैं ॥१॥
Subject
अब चतुर्थ अष्टक में छठे अध्याय और छठे मण्डल में पन्द्रह ऋचावाले सत्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥