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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 7

75 Sukta
48 Mantra
6/16/7
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- आर्च्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने स्वा॒ध्यो॒३॒॑ मर्ता॑सो दे॒ववी॑तये। य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते ॥७॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । मर्ता॑सः । दे॒वऽवी॑तये । य॒ज्ञेषु॑ । दे॒वम् । ई॒ळ॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने स्वाध्यो३ मर्तासो देववीतये। यज्ञेषु देवमीळते ॥

त्वाम्। अग्ने। सुऽआध्यः। मर्तासः। देवऽवीतये। यज्ञेषु। देवम्। ईळते ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) विद्या और विनय से प्रकाशात्मा विद्वन् ! जैसे (स्वाध्यः) उत्तम प्रकार चारों ओर से ध्यान करनेवाले (मर्त्तासः) मनुष्य (देववीतये) विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये (यज्ञेषु) पढ़ाने पढ़ने और उपदेश नामक व्यवहारों में (त्वाम्) पूर्ण विद्यायुक्त यथार्थवक्ता आप (देवम्) विज्ञान के देनेवाले की (ईळते) स्तुति करते हैं, उस प्रकार से हम लोग प्रशंसा करें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्या की प्राप्ति के लिये विद्वानों का सेवन करें और जैसे सृष्टि के पदार्थों में अग्नि प्रशंसित है, वैसे ही मनुष्यों में धार्मिक विद्वान् हैं, यह जानना चाहिये ॥७॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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