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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 5

75 Sukta
48 Mantra
6/16/5
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वमि॒मा वार्या॑ पु॒रु दिवो॑दासाय सुन्व॒ते। भ॒रद्वा॑जाय दा॒शुषे॑ ॥५॥

त्वम् । इ॒मा । वार्या॑ । पु॒रु । दिवः॑ऽदासाय । सु॒न्व॒ते । भ॒रत्ऽवा॑जाय । दा॒शुषे॑ ॥

Mantra without Swara
त्वमिमा वार्या पुरु दिवोदासाय सुन्वते। भरद्वाजाय दाशुषे ॥

त्वम्। इमा। वार्या। पुरु। दिवःऽदासाय। सुन्वते। भरत्ऽवाजाय। दाशुषे ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे विद्वन् ! जिस कारण से (त्वम्) आप (दिवोदासाय) कामना करने योग्य पदार्थ के देने और (सुन्वते) सोमलतारूप ओषधि आदि की सिद्धि करनेवाले और (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिसने उसके और (दाशुषे) विज्ञान के देनेवाले के लिये (इमा) इन (पुरु) बहुत (वार्य्या) स्वीकार करने योग्यों को देते हो, इससे प्रशंसा करने योग्य हो ॥५॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सत्य के उपदेशकों और विद्या के प्रचारकों का सदा ही सत्कार करें, अन्य जनों का नहीं ॥५॥
Subject
मनुष्य किसका सत्कार करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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