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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 45

75 Sukta
48 Mantra
6/16/45
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद॑ग्ने भारत द्यु॒मदज॑स्रेण॒ दवि॑द्युतत्। शोचा॒ वि भा॑ह्यजर ॥४५॥

उउ । अ॒ग्ने॒ । भा॒र॒त॒ । द्यु॒ऽमत् । अज॑स्रेण । दवि॑द्युतत् । शोच॑ । वि । भा॒हि॒ । अ॒ज॒र॒ ॥

Mantra without Swara
उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्। शोचा वि भाह्यजर ॥

उत्। अग्ने। भारत। द्युऽमत्। अजस्रेण। दविद्युतत्। शोच। वि। भाहि। अजर ॥४५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 29 Mantra » 5

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Meaning
हे (भारत) धारण करनेवाले (अजर) जरा दोष से रहित (अग्ने) विद्वन् ! आप (अजस्रेण) निरन्तर (द्युमत्) प्रकाशवाले को (दविद्युतत्) प्रकाशित करते हो, उसके लिये आप (उत्, शोचा) अत्यन्त प्रकाशित हूजिये और (वि, भाहि) विशेष करके प्रकाशित करिये ॥४५॥
Essence
जैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य्य निरन्तर प्रकाशित होता है, वैसे ही विद्वान् जन सत्य व्यवहार में प्रकाशित हों ॥४५॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥