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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 42

75 Sukta
48 Mantra
6/16/42
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- साम्नीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ जा॒तं जा॒तवे॑दसि प्रि॒यं शि॑शी॒ताति॑थिम्। स्यो॒न आ गृ॒हप॑तिम् ॥४२॥

आ । जा॒तम् । जा॒तऽवे॑दसि । प्रि॒यम् । शि॒शी॒त॒ । अति॑थिम् । स्यो॒ने । आ । गृ॒हऽप॑तिम् ॥

Mantra without Swara
आ जातं जातवेदसि प्रियं शिशीतातिथिम्। स्योन आ गृहपतिम् ॥

आ। जातम्। जातऽवेदसि। प्रियम्। शिशीत। अतिथिम्। स्योने। आ। गृहऽपतिम् ॥४२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 29 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! (जातवेदसि) प्राप्त हुई विद्या जिसमें उसमें (आ, जातम्) अच्छे प्रकार प्रसिद्ध (प्रियम्) प्रिय (अतिथिम्) अतिथि के समान वर्त्तमान को (स्योने) सुख में (गृहपतिम्) गृह के स्वामी को (आ, शिशीत) अच्छे प्रकार तीक्ष्ण करिये ॥४२॥
Essence
जो व्याप्त बिजली को प्रज्वलित कराते हैं, वे सब स्थानों में विजय आदि को प्राप्त होते हैं ॥४२॥
Subject
विद्वानों को चाहिये कि श्रेष्ठ गृहस्थों का सत्कार करें, इस विषय को कहते हैं ॥