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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 4

75 Sukta
48 Mantra
6/16/4
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वामी॑ळे॒ अध॑ द्वि॒ता भ॑र॒तो वा॒जिभिः॑ शु॒नम्। ई॒जे य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञिय॑म् ॥४॥

त्वाम् । ई॒ळे॒ । अध॑ । द्वि॒ता । भ॒र॒तः । वा॒जिऽभिः॑ । शु॒नम् । ई॒जे । य॒ज्ञेषु॑ । य॒ज्ञिय॑म् ॥

Mantra without Swara
त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम्। ईजे यज्ञेषु यज्ञियम् ॥

त्वाम्। ईळे। अध। द्विता। भरतः। वाजिऽभिः। शुनम्। ईजे। यज्ञेषु। यज्ञियम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् ! जैसे मैं (यज्ञेषु) समागमरूप यज्ञों में (यज्ञियम्) यज्ञ करने योग्य (त्वाम्) आप विद्वान् की (ईळे) प्रशंसा करता हूँ (अध) इसके अनन्तर (द्विता) दो पढ़ाने और पढ़नेवाले वा उपदेश करने वा उपदेश पाने योग्यों का (भरतः) धारण और पोषण करनेवाला मैं (वाजिभिः) विज्ञानादिकों से (शुनम्) सुख की (ईजे) सङ्गति करता हूँ, वैसे आप सङ्गति कीजिये ॥४॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि परस्पर विद्या की उन्नति करके अन्यों को ग्रहण करावें ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥