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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 39

75 Sukta
48 Mantra
6/16/39
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य उ॒ग्रइ॑व शर्य॒हा ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ न वंस॑गः। अग्ने॒ पुरो॑ रु॒रोजि॑थ ॥३९॥

यः । उ॒ग्रःऽइ॑व । श॒र्य॒ऽहा । ति॒ग्मऽशृ॑ङ्गः । न । वंस॑ऽगः । अग्ने॑ । पुरः॑ । रु॒रोजि॑थ ॥

Mantra without Swara
य उग्रइव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वंसगः। अग्ने पुरो रुरोजिथ ॥

यः। उग्रःऽइव। शर्यऽहा। तिग्मऽशृङ्गः। न। वंसऽगः। अग्ने। पुरः। रुरोजिथ ॥३९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (यः) जो आप (वंसगः) सेवन करने योग्य व्यवहार को प्राप्त होने और (शर्यहा) मारने योग्य को मारनेवाले (तिग्मशृङ्गः) तीव्र शृङ्गों के सदृश किरणोंवाले सूर्य्य के (न) समान शत्रुओं के (पुरः) आगे (उग्रइव) तेजस्वी जन जैसे वैसे (रुरोजिथ) भग्न करते हो, उन आप का हम लोग सत्कार करें ॥३९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा आदि अधिकारी जन सूर्य्य जैसे वैसे तेजस्वी होवें, वे शत्रुओं के जीतने को समर्थ होवें ॥३९॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥