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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 38

75 Sukta
48 Mantra
6/16/38
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑च्छा॒यामि॑व॒ घृणे॒रग॑न्म॒ शर्म॑ ते व॒यम्। अग्ने॒ हिर॑ण्यसंदृशः ॥३८॥

उप॑ । छा॒याम्ऽइ॑व । घृणेः॑ । अग॑न्म । शर्म॑ । ते॒ । व॒यम् । अग्ने॑ । हिर॑ण्यऽसन्दृशः ॥

Mantra without Swara
उपच्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्। अग्ने हिरण्यसंदृशः ॥

उप। छायाम्ऽइव। घृणेः। अगन्म। शर्म। ते। वयम्। अग्ने। हिरण्यऽसन्दृशः ॥३८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (ते) आपके (घृणेः) प्रदीप्त सूर्य्य से (छायामिव) छाया को जैसे वैसे (शर्म) गृह को (हिरण्यसन्दृशः) तेज के सदृश समान दर्शन जिनका ऐसे (वयम्) हम लोग (उप) समीप (अगन्म) प्राप्त होवें ॥३८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वन् ! हम लोग सब ऋतुओं में हुए सूर्य्य को जैसे वैसे प्रकाशमान आपके गृह को प्राप्त होकर छाया के सदृश सेवन करें ॥३८॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥