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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 37

75 Sukta
48 Mantra
6/16/37
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑ त्वा र॒ण्वसं॑दृशं॒ प्रय॑स्वन्तः सहस्कृत। अग्ने॑ ससृ॒ज्महे॒ गिरः॑ ॥३७॥

उप॑ । त्वा॒ । र॒ण्वऽस॑न्दृशम् । प्रय॑स्वन्तः । स॒हः॒ऽकृ॒त॒ । अग्ने॑ । स॒सृ॒ज्महे॑ । गिरः॑ ॥

Mantra without Swara
उप त्वा रण्वसंदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत। अग्ने ससृज्महे गिरः ॥

उप। त्वा। रण्वऽसन्दृशम्। प्रयस्वन्तः। सहःऽकृत। अग्ने। ससृज्महे। गिरः ॥३७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्कृत) सहसा कार्य्यकर्ता (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् ! (प्रयस्वन्तः) प्रयत्न करते हुए हम लोग जिन (गिरः) वाणियों को (ससृज्महे) अत्यन्त प्रकट करें उनसे (रण्वसन्दृशम्) रमणीय के तुल्य (त्वा) आपको (उप) समीप में अत्यन्त प्रकट करें ॥३७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जैसे अपने प्रयोजन की प्रिय वाणी हृदय को प्रिय होती है, वैसे अन्य जनों के प्रयोजन को भी समझें ॥३७॥
Subject
मनुष्य कैसे वाणी को प्रयुक्त करें, इस विषय को कहते हैं ॥