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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 36

75 Sukta
48 Mantra
6/16/36
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ब्रह्म॑ प्र॒जाव॒दा भ॑र॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। अग्ने॒ यद्दी॒दय॑द्दि॒वि ॥३६॥

ब्रह्म॑ । प्र॒जाऽव॑त् । आ । भ॒र॒ । जात॑ऽवेदः॑ । विऽच॑र्षणे । अग्ने॑ । यत् । दी॒दय॑त् । दि॒वि ॥

Mantra without Swara
ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे। अग्ने यद्दीदयद्दिवि ॥

ब्रह्म। प्रजाऽवत्। आ। भर। जातऽवेदः। विऽचर्षणे। अग्ने। यत्। दीदयत्। दिवि ॥३६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे (जातवेदः) धन से युक्त (विचर्षणे) बुद्धिमान् (अग्ने) अग्नि के समान गृहस्थ ! (यत्) जो ज्योति (दिवि) प्रकाश में (दीदयत्) प्रकाशित करती है, उससे (प्रजावत्) प्रजा में विद्यमान जिसमें उस (ब्रह्म) धन वा अन्न को (आ, भर) सब प्रकार से धारण वा पोषण करिये ॥३६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अग्नि में, जो सूर्य्य में और जो बिजुली में तेज है, उसके विज्ञान से धन और धान्य की उन्नति करिये ॥३६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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