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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 25

75 Sukta
48 Mantra
6/16/25
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वस्वी॑ ते अग्ने॒ संदृ॑ष्टिरिषय॒ते मर्त्या॑य। ऊर्जो॑ नपाद॒मृत॑स्य ॥२५॥

वस्वी॑ । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । सम्ऽदृ॑ष्टिः । इ॒ष॒ऽय॒ते । मर्त्या॑य । ऊर्जः॑ । न॒पा॒त् । अ॒मृत॑स्य ॥

Mantra without Swara
वस्वी ते अग्ने संदृष्टिरिषयते मर्त्याय। ऊर्जो नपादमृतस्य ॥

वस्वी। ते। अग्ने। सम्ऽदृष्टिः। इषऽयते। मर्त्याय। ऊर्जः। नपात्। अमृतस्य ॥२५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान (ते) आपकी (वस्वी) पृथिवी आदि वसुसम्बन्धिनी (सन्दृष्टिः) उत्तम प्रकार देखते जिससे वह दृष्टि (इषयते) अन्न वा विज्ञान की कामना करते हुए (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (अमृतस्य) नाशरहित और (ऊर्जः) बल आदि युक्त की (नपात्) नहीं गिरनेवाली होती है ॥२५॥
Essence
जिस विद्वान् का विद्यादर्शन-विद्या निष्फल नहीं होता और जिससे पढ़कर विद्यार्थी जन विद्वान् होते हैं, उसका सदा सत्कार करो ॥२५॥
Subject
उत्तम जन का व्यवहार वा सङ्ग निष्फल नहीं होता, इस विषय को कहते हैं ॥