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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 22

75 Sukta
48 Mantra
6/16/22
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र वः॑ सखायो अ॒ग्नये॒ स्तोमं॑ य॒ज्ञं च॑ धृष्णु॒या। अर्च॒ गाय॑ च वे॒धसे॑ ॥२२॥

प्र । वः॒ । स॒खा॒यः॒ । अ॒ग्नये॑ । स्तोम॑म् । य॒ज्ञम् । च॒ । धृ॒ष्णु॒ऽया । अर्च॑ । गाय॑ । च॒ । वे॒धसे॑ ॥

Mantra without Swara
प्र वः सखायो अग्नये स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया। अर्च गाय च वेधसे ॥

प्र। वः। सखायः। अग्नये। स्तोमम्। यज्ञम्। च। धृष्णुऽया। अर्च। गाय। च। वेधसे ॥२२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
हे (सखायः) मित्रो ! जो (वः) आप लोगों की (स्तोमम्) स्तुति और (यज्ञम्) सत्य व्यवहार को (च) भी उत्पन्न करता है, उसका आप लोग सत्कार करो और हे विद्वन् ! जो आप में जैसे मित्र, वैसे वर्त्तता है उस (वेधसे) बुद्धिमान् (अग्नये) अग्नि के समान वर्त्तमान के लिये आप (धृष्णुया) दृढ़ता के साथ (प्र, अर्च) अच्छे प्रकार सत्कार करिये (गाय, च) और प्रशंसा करिये ॥२२॥
Essence
सूर्य्य ही यज्ञफलों की प्राप्ति का साधक है, वैसे यथार्थ कहने और करनेवाले धर्म्मात्मा जन परोपकार में कुशल होते हैं, ऐसा जानकर संसार में वर्त्ताव करे ॥२॥
Subject
मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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