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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 21

75 Sukta
48 Mantra
6/16/21
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स प्र॑त्न॒वन्नवी॑य॒साग्ने॑ द्यु॒म्नेन॑ सं॒यता॑। बृ॒हत्त॑तन्थ भा॒नुना॑ ॥२१॥

सः । प्र॒त्न॒ऽवत् । नवी॑यसा । अग्ने॑ । द्यु॒म्नेन॑ । स॒म्ऽयता॑ । बृ॒हत् । त॒त॒न्थ॒ । भा॒नुना॑ ॥

Mantra without Swara
स प्रत्नवन्नवीयसाग्ने द्युम्नेन संयता। बृहत्ततन्थ भानुना ॥

सः। प्रत्नऽवत्। नवीयसा। अग्ने। द्युम्नेन। सम्ऽयता। बृहत्। ततन्थ। भानुना ॥२१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वन् ! जैसे सूर्य्य (भानुना) किरण से (प्रत्नवत्) प्राचीन के सदृश (बृहत्) बड़े को (ततन्थ) विस्तृत करता है, वैसे (सः) वह आप (नवीयसा) अत्यन्त नवीन (संयता) उत्तम प्रकार देते हैं जिससे, उस (द्युम्नेन) धन वा यश से हम लोगों को विस्तृत करो ॥२१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के सदृश यशस्वी होते हैं, वे नवीन-नवीन प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥२१॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥