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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 2

75 Sukta
48 Mantra
6/16/2
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नो॑ म॒न्द्राभि॑रध्व॒रे जि॒ह्वाभि॑र्यजा म॒हः। आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च ॥२॥

सः । नः॒ । म॒न्द्राभिः॑ । अ॒ध्व॒रे । जि॒ह्वाभिः॑ । य॒ज॒ । म॒हः । आ । दे॒वान् । व॒क्षि॒ । यक्षि॑ । च॒ ॥

Mantra without Swara
स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः। आ देवान्वक्षि यक्षि च ॥

सः। नः। मन्द्राभिः। अध्वरे। जिह्वाभिः। यज। महः। आ। देवान्। वक्षि। यक्षि। च ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वन् ! अग्नि के सदृश तेजस्वी (सः) वह आप (अध्वरे) सब प्रकार अनुष्ठान करने योग्य धर्म्मयुक्त व्यवहार में (मन्द्राभिः) आनन्द करनेवाली (जिह्वाभिः) विद्या और विनय से युक्त वाणियों से (नः) हम लोगों को (यजा) प्राप्त कराइये और (महः) बड़े अथवा सत्कार करने योग्यों को और (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों को (आ, वक्षि) प्राप्त कराइये और सब को (यक्षि, च) भी प्राप्त कराइये ॥२॥
Essence
विद्वान् जन विद्या की प्राप्ति के लिये सब को सदा उपदेश देवें, जिससे श्रेष्ठ गुणोंवाले मनुष्य होवें ॥२॥
Subject
फिर विद्वान् क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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