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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 19

75 Sukta
48 Mantra
6/16/19
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आग्निर॑गामि॒ भार॑तो वृत्र॒हा पु॑रु॒चेत॑नः। दिवो॑दासस्य॒ सत्प॑तिः ॥१९॥

आ । अ॒ग्निः । अ॒गा॒मि॒ । भार॑तः । वृ॒त्र॒ऽहा । पु॒रु॒ऽचेत॑नः । दिवः॑ऽदासस्य । सत्ऽप॑तिः ॥

Mantra without Swara
आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः। दिवोदासस्य सत्पतिः ॥

आ। अग्निः। अगामि। भारतः। वृत्रऽहा। पुरुऽचेतनः। दिवःऽदासस्य। सत्ऽपतिः ॥१९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जो (दिवोदासस्य) प्रकाश के देनेवाले का (भारतः) धारण करने वा पोषण करने और (वृत्रहा) मेघ को नाश करनेवाला (पुरुचेतनः) बहुत चेतन जिसमें वह (सत्पतिः) श्रेष्ठ स्वामी (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी सूर्य्य (आ, अगामि) प्राप्त किया जाता है, उसका हम लोग सेवन करें ॥१९॥
Essence
जैसे इस देह में साधन और उपसाधनों के सहित जीव बहुत कर्म्मों को करता है, वैसे ही विद्वान् सम्पूर्ण कर्म्मों को सिद्ध करता है ॥१९॥
Subject
अब अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥