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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 17

75 Sukta
48 Mantra
6/16/17
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यत्र॒ क्व॑ च ते॒ मनो॒ दक्षं॑ दधस॒ उत्त॑रम्। तत्रा॒ सदः॑ कृणवसे ॥१७॥

यत्र॑ । क्व॑ । च॒ । ते॒ । मनः॑ । दक्ष॑म् । द॒ध॒से॒ । उत्ऽत॑रम् । तत्र॑ । सदः॑ । कृ॒ण॒व॒से॒ ॥

Mantra without Swara
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्। तत्रा सदः कृणवसे ॥

यत्र। क्व। च। ते। मनः। दक्षम्। दधसे। उत्ऽतरम्। तत्र। सदः। कृणवसे ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे विद्वन् ! (यत्र) जहाँ (ते) आप का (मनः) विचारात्मक चित्त है और (उत्तरम्) पार होते हैं जिससे उस (दक्षम्) बल को (च) भी आप (दधसे) धारण करते हो (तत्र) वहाँ (सदः) स्थित होते हैं, जिसमें उसको (कृणवसे) करते हो तथा (क्व) कहाँ निवास करते हो, इस का उत्तर कहिये ॥१७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जहाँ जगदीश्वर वा योगाभ्यास में आप लोगों का अन्तःकरण पवित्र होकर कार्य्य की सिद्धि को करता है, वहाँ ही आप लोग भी प्रवृत्ति करिये ॥१७॥
Subject
मनुष्यों को कहाँ मन स्थित करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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