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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 15

75 Sukta
48 Mantra
6/16/15
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा पा॒थ्यो वृषा॒ समी॑धे दस्यु॒हन्त॑मम्। ध॒नं॒ज॒यं रणे॑रणे ॥१५॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । पा॒थ्यः । वृषा॑ । सम् । ई॒धे॒ । द॒स्यु॒हन्ऽत॑मम् । ध॒न॒म्ऽज॒यम् । रणे॑ऽरणे ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्। धनंजयं रणेरणे ॥

तम्। ऊँ इति। त्वा। पाथ्यः। वृषा। सम्। ईधे। दस्युहन्ऽतमम्। धनम्ऽजयम्। रणेऽरणे ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (पाथ्यः) मार्गों में हुए (वृषा) वर्षानेवाले सूर्य्य के समान वीर्य्य का सींचनेवाला (दस्युहन्तमम्) डाकुओं को अतिशय मारनेवाले (रणेरणे) प्रत्येक संग्राम में (धनञ्जयम्) धन को जीते (तम्) उन (त्वा) आपको (सम्, ईधे) प्राप्त कराता है, वैसे आप मुझे को (उ) भी प्राप्त कराइये ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! यदि आप लोग बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर युद्ध करो तो आप लोगों का बहुत धन और ऐश्वर्य्यों का देनेवाला मैं बिजुली आदि से विजय कराऊँ ॥१५॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥