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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 13

75 Sukta
48 Mantra
6/16/13
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने॒ पुष्क॑रा॒दध्यथ॑र्वा॒ निर॑मन्थत। मू॒र्ध्नो विश्व॑स्य वा॒घतः॑ ॥१३॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । पुष्क॑रात् । अधि॑ । अथ॑र्वा । निः । अ॒म॒न्थ॒त॒ । मू॒र्ध्नः । विश्व॑स्य । वा॒घतः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥

त्वाम्। अग्ने। पुष्करात्। अधि। अथर्वा। निः। अमन्थत। मूर्ध्नः। विश्वस्य। वाघतः ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे (वाघतः) बुद्धिमान् जन (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् के (मूर्ध्नः) ऊपर वर्त्तमान के (पुष्करात्) अन्तरिक्ष से (अधि) ऊपर अग्नि को (निः, अमन्थत) मथते हैं, वैसे (अथर्वा) अहिंसक मैं (त्वाम्) आपको प्रकाशित करता हूँ ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! जैसे पदार्थविद्या के जाननेवाले जन सूर्य्य आदि के समीप से बिजुली को ग्रहण करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही आप लोग भी सिद्ध करो ॥१३॥
Subject
मनुष्य किस-किससे बिजुली का ग्रहण करें, इस विषय को कहते हैं ॥