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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 12

75 Sukta
48 Mantra
6/16/12
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- साम्नीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नः॑ पृ॒थु श्र॒वाय्य॒मच्छा॑ देव विवाससि। बृ॒हद॑ग्ने सु॒वीर्य॑म् ॥१२॥

सः । नः॒ । पृ॒थु । श्र॒वाय्य॑म् । अच्छ॑ । दे॒व॒ । वि॒वा॒स॒सि॒ । बृ॒हत् । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽवीर्य॑म् ॥

Mantra without Swara
नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि। बृहदग्ने सुवीर्यम् ॥

सः। नः। पृथु। श्रवाय्यम्। अच्छ। देव। विवाससि। बृहत्। अग्ने। सुऽवीर्यम् ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) विद्या के देनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान कार्य्य के साधक ! जैसे अग्नि वैसे जिस कारण से आप (नः) हम लोगों के लिये (पृथु) विस्तारयुक्त (श्रवाय्यम्) सुनने योग्य (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) श्रेष्ठ बलयुक्त (अच्छा) अच्छे प्रकार (विवाससि) सेवा करते हो, इससे (सः) वह आप सत्कार करने योग्य हो ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जिसका उपकार करते हैं, वे उनके सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१२॥
Subject
फिर मनुष्यों को परस्पर कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥