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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 11

75 Sukta
48 Mantra
6/16/11
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य ॥११॥

तम् । त्वा॒ । स॒मित्ऽभिः॑ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । घृ॒तेन॑ । व॒र्ध॒या॒म॒सि॒ । बृ॒हत् । शो॒च॒ । य॒वि॒ष्ठ्य॒ ॥

Mantra without Swara
तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य ॥

तम्। त्वा। समित्ऽभिः। अङ्गिरः। घृतेन। वर्धयामसि। बृहत्। शोच। यविष्ठ्य ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 1

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Meaning
हे (यविष्ठ्य) अत्यन्त युवा जनों में साधु (अङ्गिरः) बिजुली के समान वर्त्तमान ! जैसे यज्ञ करनेवाले जन (समिद्भिः) उत्तम प्रकार प्रकाशक समिध्रूप काष्ठों और (घृतेन) घृत से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे ज्ञान के कारण उपदेश से (तम्) उन (त्वा) आपकी हम लोग (वर्धयामसि) वृद्धि करते हैं और आप (बृहत्) बहुत (शोचा) विचारिये ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन जैसे घृत से अग्नि की, वैसे शिक्षा और सत्कार से शूर जनों की वृद्धि करते हैं, वे सदा विजय को प्राप्त होते हैं ॥११॥
Subject
फिर मनुष्य परस्पर क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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