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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 10

75 Sukta
48 Mantra
6/16/10
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्न॒ आ या॑हि वी॒तये॑ गृणा॒नो ह॒व्यदा॑तये। नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषि॑ ॥१०॥

अग्ने॑ । आ । या॒हि॒ । वी॒तये॑ । गृ॒णा॒नः । ह॒व्यऽदा॑तये । नि । होता॑ । स॒त्सि॒ । ब॒र्हिषि॑ ॥

Mantra without Swara
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

अग्ने। आ। याहि। वीतये। गृणानः। हव्यऽदातये। नि। होता। सत्सि। बर्हिषि ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! जिस कारण से आप (गृणानः) स्तुति करते हुए (होता) दाता (बर्हिषि) उत्तम सभा में (वीतये) विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों की व्याप्ति के लिये और (हव्यदातये) देने योग्य के दान के लिये (नि, सत्सि) उत्तम प्रकार जानते हो इससे हम लोगों की उत्तम दीप्ति को (आ, याहि) सब प्रकार प्राप्त होओ ॥१०॥
Essence
जहाँ विद्वान् जन विद्या की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं, वहाँ सब सुखी होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥