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Rigveda Mandal 6 / Sukta 16 / Mantra 1

75 Sukta
48 Mantra
6/16/1
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- आर्च्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने य॒ज्ञानां॒ होता॒ विश्वे॑षां हि॒तः। दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑ ॥१॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । य॒ज्ञाना॑म् । होता॑ । विश्वे॑षाम् । हि॒तः । दे॒वेभिः॑ । मानु॑षे । जने॑ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने ॥

त्वम्। अग्ने। यज्ञानाम्। होता। विश्वेषाम्। हितः। देवेभिः। मानुषे। जने ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) जगदीश्वर ! जिस कारण से (त्वम्) आप (यज्ञानाम्) प्राप्त होने योग्य व्यवहारों के (होता) देनेवाले और (विश्वेषाम्) सब के (हितः) हितकारी हो इससे (देवेभिः) विद्वानों के साथ (मानुषे) मनुष्य-सम्बन्धी (जने) मनुष्य में प्रेरणा करनेवाले होओ ॥१॥
Essence
हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर सब का हितकारी और सम्पूर्ण सुखों का देनेवाला तथा विद्वानों के सङ्ग से जानने योग्य है, वैसे आप लोग भी अनुष्ठान करो ॥१॥
Subject
अब अड़तालीस ऋचावाले सोलहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान् क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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