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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 9

75 Sukta
19 Mantra
6/15/9
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒भूष॑न्नग्न उ॒भयाँ॒ अनु॑ व्र॒ता दू॒तो दे॒वानां॒ रज॑सी॒ समी॑यसे। यत्ते॑ धी॒तिं सु॑म॒तिमा॑वृणी॒महेऽध॑ स्मा नस्त्रि॒वरू॑थः शि॒वो भ॑व ॥९॥

वि॒ऽभूष॑न् । अ॒ग्ने॒ । उ॒भया॒न् । अनु॑ । व्र॒ता । दू॒तः । दे॒वाना॑म् । रज॑सी॒ इति॑ । सम् । ई॒य॒से॒ । यत् । ते॒ । धी॒तिम् । सु॒ऽम॒तिम् । आ॒ऽवृ॒णी॒महे॑ । अध॑ । स्म॒ । नः॒ । त्रि॒ऽवरू॑थः । शि॒वः । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे। यत्ते धीतिं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव ॥

विऽभूषन्। अग्ने। उभयान्। अनु। व्रता। दूतः। देवानाम्। रजसी इति। सम्। ईयसे। यत्। ते। धीतिम्। सुऽमतिम्। आऽवृणीमहे। अध। स्म। नः। त्रिऽवरूथः। शिवः। भव ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सम्पूर्ण दुःखों को जलाने अर्थात् दूर करनेवाले परमेश्वर ! जो आप (रजसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (देवानाम्) विद्वानों के (दूतः) दोषों को दूर करने अथवा धर्म्म, अर्थ और मोक्ष को प्राप्त करानेवाले होते हुए (व्रता) कर्मों को (विभूषन्) शोभित करते और (उभयान्) विद्वान् और अविद्वान् मनुष्यों को (अनु) पीछे शोभित करते हुए अन्तरिक्ष और पृथिवी को (सम्, ईयसे) व्याप्त होते हैं और (यत्) जिस (ते) आपकी (धीतिम्) धारणा वा बुद्धि को (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि को हम लोग (आवृणीमहे) स्वीकार करें वह (अध) इसके अनन्तर (त्रिवरूथः) तीन उत्तम, मध्यम, निकृष्ट गृहों के सदृश निवासस्थानवाले आप (नः) हम लोगों के लिये (शिवः) कल्याणकारी (स्मा) ही (भव) हूजिये ॥९॥
Essence
जो मनुष्य जगत् के रचनेवाले ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करते हैं तथा उसके गुण, कर्म्म और स्वभावों के सदृश अपने गुण, कर्म्म और स्वभावों को करते हैं, उनको वह जैसे दूत, वैसे सब विद्या के समाचार को जनाता हुआ सहज से मुक्ति के पदको प्राप्त कराता है, इससे सब काल में ही इसकी उपासना करनी चाहिये ॥९॥
Subject
फिर वह उपासित ईश्वर क्या करता है, इस विषय को कहते हैं ॥