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Rigveda Mandal 6 / Sukta 15 / Mantra 8

75 Sukta
19 Mantra
6/15/8
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वां दू॒तम॑ग्ने अ॒मृतं॑ यु॒गेयु॑गे हव्य॒वाहं॑ दधिरे पा॒युमीड्य॑म्। दे॒वास॑श्च॒ मर्ता॑सश्च॒ जागृ॑विं वि॒भुं वि॒श्पतिं॒ नम॑सा॒ नि षे॑दिरे ॥८॥

त्वाम् । दू॒तम् । अ॒ग्ने॒ । अ॒मृत॑म् । यु॒गेऽयु॑गे । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । द॒धि॒रे॒ । पा॒युम् । ईड्य॑म् । दे॒वासः॑ । च॒ । मर्ता॑सः । च॒ । जागृ॑विम् । वि॒ऽभुम् । वि॒श्पति॑म् । नम॑सा । नि । से॒दि॒रे॒ ॥

Mantra without Swara
त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्। देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विश्पतिं नमसा नि षेदिरे ॥

त्वाम्। दूतम्। अग्ने। अमृतम्। युगेऽयुगे। हव्यऽवाहम्। दधिरे। पायुम्। ईड्यम्। देवासः। च। मर्तासः। च। जागृविम्। विऽभुम्। विश्पतिम्। नमसा। नि। सेदिरे ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशमान भगवन् ! (युगेयुगे) वर्ष वर्ष वा सत्ययुग आदि में जिस (हव्यवाहम्) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को धारण करनेवाले (ईड्यम्) स्तुति करने योग्य (पायुम्) पालन करनेवाले (विश्पतिम्) मनुष्य आदि प्रजाओं के पालक (जागृविम्) सदा जागनेवाले (अमृतम्) नाश से रहित (दूतम्) दुःखों के दूर करनेवाले (विभुम्) व्यापक परमात्मा (त्वाम्) आपको (देवासः) विद्वान् (च) और योगी (मर्त्तासः) मरण धर्म्मवाले (च) भी (नमसा) सत्कार से (दधिरे) धारण और योगी (मर्त्तासः) मरण धर्म्मवाले (च) भी (नमसा) सत्कार से (दधिरे) धारण करें (नि, सेदिरे) स्थित होते हैं, उसको हम लोग धारण करें तथा उसमें स्थित होवें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग प्रतिदिन सर्वव्यापी, न्यायेश, दयालु, सब धन्यवादों के योग्य, परमात्मा ही की उपासना करो ॥८॥
Subject
मनुष्यों से =को किसकी उपासना करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥